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Friday, January 17, 2014

आखें नम हो गई पीड़ितों की पीड़ा देखकर

आखें नम हो गई मित्रों जब मुझे मालूम हुआ कि मुजफ्फरनगर दंगे के कारण 'अपनों' की 'हाय' से 'अभिशप्त' सपा सरकार के राज में मजलूमों के मुंह का निवाला भी छिन गया है। शाहपुर कस्बे में ईदगाह के पास रह रहे पीड़ितों को वह सरकारी राशन मयस्सर नहीं है, जिसके वे हकदार हैं। मजबूरन, ये लोग बाजार से महंगा गेहूं, चावल खरीदकर पेट की आग बुझा रहे हैं। आटे के खाली कनस्तर और टेंटों में टिमटिमा रहीं मोमबत्तियां उनकी मजबूरी की दास्तां बयां करती हैं। यह जिम्मा जिला प्रशासन का था लेकिन गरीबों का दर्द न तो हाकिम महसूस कर सके और न हुक्काम। शिविरों के बाद लोग इधर-उधर जाकर बस गये। 

शाहपुर कस्बे में ईदगाह के पास भी शुरू में लगभग 300 परिवार आकर बसे थे। चूंकि, ये लोग अब अपने गांव लौटना नहीं चाहते, इसलिये 70-80 परिवार इसी स्थान पर टेंट डालकर रह रहे हैं। फिलवक्त इन्हें सरकारी इमदाद या राशन आदि नहीं दिया जा रहा है। यहां पड़े लोगों का काम धंधा ठप है। लगभग सभी परिवारों के राशन कार्ड बने हुए हैं लेकिन ताज्जुब यह है कि इन्हें तीन माह से सरकारी राशन, तेल आदि मयस्सर नहीं हो सका है। चूंकि, गांव में ये राशन लेने गये नहीं और शासन-प्रशासन ने यहां बंटवाने की व्यवस्था नहीं की।

दोस्तों मैं अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप इन मासूम लोगों की सहायता करने का प्रयत्न कर रहा हूँ। क्या आप भी सहयोग देंगे? 
 

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