बहुत ही निराशा होती है यह
देख्कर कि औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे के निस्तारण की व्यवस्था करने में
अद्यौगिक इकाइयां पूरे तरह से फेल हैं। औद्योगिक इकाइयों के आसपास वाले गांव के
लोग कचरे की समस्या से इतना परेशान हैं कि उनको जीवन खतरे में नजर आने लगा है।
औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले कचरे के निस्तारण का ठेका लेने वालों के प्रभाव
के आगे ग्रामीणों के विरोध के स्वर अफसरों के कानों को सुनाई नहीं देते।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने तालाबों के सुंदरीकरण उनसे अवैध कब्जा
हटवाने पर पूरी प्रशासनिक मशीनरी का जोर लगा दिया। अभियान भी चला, कुछ सकारात्मक नतीजे भी सामने आए। पर औद्योगिक क्षेत्र में
औद्योगिक इकाइयों के खतरनाक कचरे से भरे तालाबों की ओर कोई हलचल नहीं हुई। प्रशासन
पूरी तरह इस ओर से आंख ही बंद किए है। औद्योगिक क्षेत्र से जुड़े गांव आशापुर,
अभयपुर, कौड़िया, गलाथा, रासूपुर, चंदेलनखेड़ा आदि गांव के तालाबों को औद्योगिक कचरे से भर
दिया गया है। यह कचरा अब जन व पशु के लिए खतरा बन गया है। बारिश में गांव के लोगों
व पशुओं के पैर कट जा रहे हैं। तालाबों की भू-गर्भ जल को रिचार्ज करने की क्षमता
ही समाप्त हो चुकी है। कचरे से भरे तालाबों को जो पानी भू-गर्भ में जा भी रहा है।
उससे भू-गर्भ जल प्रदूषित हो रहा है।
मित्रों अब तो हमें स्वयं ही इन कार्यों में हाथ डालना होगा। क्या आप साथ
देंगें ?
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