50 साल के
तरुण तेजपाल का
जन्म 15 मार्च 1963 को हुआ
था। पिता सेना
में थे। लिहाजा
देश के अलग
अलग हिस्सों में
रहे और पढ़ाई
की। चंडीगढ़ में
पंजाब यूनिवर्सिटी से
अर्थशास्त्र में ग्रेजुएशन
किया और पत्रकारिता
की ओर मुड़
गए।
करीब
30 साल से पत्रकारिता
जगत में सक्रिय
तेजपाल ने अपने
करियर की शुरुआत
1980 के दशक में
इंडिया टुडे से
की। इसके बाद
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस, द
टेलीग्राफ और आउटलुक
पत्रिका में भी
काम किया। आउटलुक
के वो मैनेजिंग
एडिटर भी रहे।
मार्च 2000 में
की
तहलका
डॉट
कॉम
की
शुरुआत
मार्च
2000 में तेजपाल ने आउटलुक
की नौकरी छोड़
दी और खोजी
वेबसाइट तहलका डॉट कॉम
की शुरुआत की।
और इसी के
साथ भारतीय पत्रकारिता
का एक नया
अध्याय शुरू हुआ।
पत्रकारिता के परंपरागत
तरीकों से इतर
तेजपाल ने एक
नई परिभाषा गढ़ी।
तहलका डॉट कॉम
में तेजपाल और
उनकी टीम ने
स्टिंग ऑपरेशन को पत्रकारिता
का नया हथियार
बनाया। इसके बाद
तहलका ने एक
के बाद एक
कई बड़े स्टिंग
ऑपरेशन किए। सियासत
से लेकर क्रिकेट,
रक्षा सौदों से
लेकर दंगों से
जुड़े तहलका के
खुलासों ने पूरे
देश को झकझोर
कर रख दिया।
केंद्र और राज्य
सरकारों को हिलाकर
रख दिया।
पहला तहलका-
ऑपरेशन
फॉलेन
हीरोज,
2000
खोजी
वेबसाइट की शुरुआत
के साथ ही
तेजपाल और उनकी
टीम ने तहलका
मचाना शुरू कर
दियाय़। तहलका डॉट कॉम
ने अपना पहला
स्टिंग साल 2000 में किया।
नाम था ऑपरेशन
फॉलेन हीरोज और
खोजी कैमरे की
जद में था
क्रिकेट का गंदा
खेल ‘फिक्सिंग’ इस
खोजी रिपोर्ट ने
आने के साथ
ही पूरे देश
में तहलका मचा
दिया। इस स्टिंग
ऑपरेशन में क्रिकेट
में मैच फिक्सिंग
का पहली बार
खुलासा हुआ था।
तहलका ने क्रिकेटर
मनोज प्रभाकर के
साथ मिलकर खुफिया
कैमरे के जरिए
क्रिकेट की कालिख
की कलई खोली।
खिलाड़ी और अफसर
पैसे के लेनदेन
की बातें करते
कैद हुए। नतीजा-
सीबीआई ने मोहम्मद
अजहरुद्दीन, अजय जडेजा
और अजय शर्मा
पर आरोप लगाए।
बीसीसीआई ने शर्मा
और अजहर पर
आजीवन प्रतिबंध लगा
दिया, जबकि जडेजा
पर पांच साल
की पाबंदी लगी।
दूसरा तहलका
- ऑपरेशन
वेस्ट
एंड,
2001
अपनी
इस रिपोर्ट में
तहलका ने रक्षा
सौदों में घूसखोरी
का सनसनीखेज खुलासा
किया। रक्षा मंत्रालय
के अफसर और
नेताओं की आपराधिक
सांठगांठ का पर्दाफाश
किया। तहलका के
स्टिंग ऑपरेशन में सेना
के अफसर और
नेता हथियारों के
सौदागर बने पत्रकारों
से घूस लेते
नजर आए। बीजेपी
के तत्कालीन अध्यक्ष
बंगारू लक्ष्मण कैमरे पर
लाख रुपए की
रिश्वत लेते कैद
हुए, जेल भी
भेजे गए। तत्कालीन
रक्षा मंत्री जॉर्ज
फर्नाडिंस को भी
गद्दी गंवानी पड़ी।
समता पार्टी की
नेता जया जेटली
पर भी केस
हुआ। तरुण तेजपाल
के इसी कारनामे
की बदौलत एशियावीक
ने साल 2001 में
उन्हें दुनिया के टॉप
50 कम्यूनिकेटर में शामिल
किया।
तीसरा तहलका-
गुजरात
दंगों
का
सच,
2007
खुफिया
कैमरे पर बीजेपी,
विश्व हिंदू परिषद
और बजरंग दल
के कई नेताओं
ने गुजरात दंगों
में अपनी भूमिका
मानी। खुफिया कैमरे
के सामने नेताओं
ने दंगों के
दौरान हैवानियत का
बखान भी किया।
गुजरात दंगों पर भी
उन्होंने स्टिंग ऑपरेशन किया
जिसमें मोदी सरकार
को कटघरे में
ला खड़ा किया।
दयानिधि मारन
और
टेलीकॉम
घोटाला
(2011)
तहलका
का एक और
अहम खुलासा 2011 में
सामने आया। ये
स्टिंग ऑपरेशन दयानिधि मारन
और टेलीकॉम घोटाला
से जुड़ा था।
डीएमके नेता और
पूर्व केंद्रीय मंत्री
की 700 करोड़ के
टेलीकॉम घोटाले में भूमिका
का खुलासा करते
हुए बताया कि
कैसे 2001 के दाम
पर ही टेलीकॉम
मंत्री रहते हुए
मारन ने एयरसेल
को लाइसेंस दिलवा
दिए।
साहित्य जगत
में
भी
है
तेजपाल
का
नाम
एक
के बाद एक
बड़े खुलासों ने
तेजपाल को पत्रकारिता
की दुनिया में
एक ऊंचे मुकाम
पर ला खड़ा
किया। देश और
दुनिया में उनके
और तहलका के
चर्चे होने लगे।
खोजी पत्रकारिता के
साथ साथ तेजपाल
ने साहित्य जगत
में भी अपनी
गहरी पैठ बनाई
है।
उन्होंने
तीन उपन्यास भी
लिखे हैं। उनका
पहला उपन्यास 2006 में
आया ‘द अलकेमी
ऑफ डिजायर’।
इसके बाद 2010 में
‘स्टोरी ऑफ माई
असैसिन (Story of my
Assassins)’। और 2011 में ‘द
वैली ऑफ मास्क्स
(The Valley of Masks)’ का प्रकाशन हुआ।
आभार : IBN 7
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