गांव में इतनी मजदूरी में काम मत करवाओ। हमको अच्छा नहीं लग रहा था। लेकिन हम क्या कर सकते थे। इसके लिए काका ने उसे डांटा भी। गांव शिवराज के लिए नेतागीरी की पहली पाठशाला था। शिवराज यहां बचपन से ही नुक्कड़ सभाएं लगाते थे। बचपन में ही शिवराज ने मजदूरों के हक में पहला आंदोलन किया और वह भी अपने ही परिवार के खिलाफ। कहते हैं हर शख्स की शख्सियत में एक नेता छिपा होता है। शिवराज के अंदर छिपे नेता को कम उम्र में ही अपने गांव की गलियों में ही बाहर आने का मौका मिल गया। मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के लिए अपने घरवालों के खिलाफ ही उन्होंने विद्रोह कर दिया। मजदूरों की मजदूरी तो बढ़ गई, लेकिन बदले में शिवराज को घरवालों की डांट मिली। मगर तब तक वे मजदूरों के नेता बन गए थे।
इस
वाकये को याद
करते हुए शिवराज
बताते हैं कि
मजदूरों को तब
ढाई पाई अनाज
ही मिलता था।
मुझे लगता था
कि दिनभर कि
ये मजदूरी बहुत
कम है। उन्हें
कम से कम
पांच पाई मिलना
चाहिए। जो चरवाहे
होते थे वो
सुबह छह बजे
से शाम तक
मेहनत करते थे।
मुझे लगता था
कि उनके साथ
ये न्याय नहीं
हो रहा है।
इसलिए मैंने मजदूरों
की बैठक की
और कहा कि
जुलूस निकालो और
मांग करो। उनके
साथ हमने जुलूस
निकाला तो जो
मजदूरी देते थे
उनको स्वाभाविक कष्ट
हुआ। उनमें हमारा
परिवार भी था।
मेरी पिटाई भी
हुई उस समय।
चाचाजी ने मुझे
पीटा था। लेकिन
मुझे लगा ये
गलत है और
मैंने गलत का
विरोध किया।
मजदूरों
को उनका हक
मिल गया, लेकिन
शिवराज को पशुओं
का गोबर उठाने
और चारा डालने
की सजा मिली।
परिवार को शिवराज
के भविष्य की
चिंता सताने लगी।
चाचा चैन सिंह
को चैन तब
आया जब शिवराज
को 1974 में नौवें
दर्जे के लिए
मॉडल हायर सेकेंडरी
स्कूल में दाखिला
मिल गया।
मॉडल
हाईस्कूल के आईने
को देखकर कभी
शिवराज सिंह बाल
संवारकर बच्चों के बीच
निकलते थे। तमाम
बच्चे इकट्ठे होते
थे और शिवराज
सिंह चौहान उनके
बीच अपनी भाषण
कला को निखारते
थे। राजनीति का
क ख ग शिवराज सिंह चौहान
ने मॉडल हायर
सेकेंडरी स्कूल में ही
सीखा। शिवराज ने
पहले दसवीं में
स्टूडेंट कैबिनेट का सांस्कृतिक
सचिव का चुनाव
लड़ा, लेकिन हार
गए। ठीक एक
साल बाद 11वीं
क्लास में अध्यक्ष
पद का चुनाव
लड़ा। उसमें शिवराज
सिंह चौहान ने
ऐतिहासिक जीत हासिल
की। शिवराज सिंह
चौहान के मध्य
प्रदेश के एक
बड़े नेता बनने
की ये स्कूल
ही बुनियाद बना।
अपने अंदाज में
भारत माता की
जय बोलना और
राजनीति में धीरज
रखने की अहमियत
शिवराज ने स्कूली
दिनों में ही
सीख ली थी।
जिंदगी का पहला
चुनाव हारने के
बाद शिवराज ने
कमबैक किया।
शिवराज
बताते हैं कि
कल्चर सेक्रेटरी का
चुनाव हार गए
थे पहली बार।
लेकिन उसके कारण
मन में ये
आया कि अगली
बार जीतना है।
अगली बार लड़ा
तो रिकॉर्डतोड़ वोटों
से प्रेसीडेंट का
चुनाव जीता। उन्होंने
कहा कि हार
नहीं मानूंगा, तब
भी नहीं मानी
अब भी नहीं
मानूंगा। हार नहीं
मानूंगा, रार नहीं
ठानूंगा। काल के
कपाल पर लिखता-मिटाता हूं, गीत
नया गाता हूं।
शिवराज
सिंह के चाचा
पोहप सिंह चौहान
कहते हैं कि
वो नेता बन
गया, इसके बाद
भी हम कहते
थे कि पढ़ाई
में समय दो।
ये नेतागीरी तो
बाद में भी
हो जाएगी। अभी
से नेतागीरी करोगे
तो पढ़ोगे कब।
नेतागीरी में भी
तो योग्यता चाहिए।
इसपर वो कहता
था कि अगर
फेल हो जाऊं
तो घर से
निकाल देना। शिवराज
सिंह फेल नहीं
हुए। वो स्कूल
में और लोकप्रिय
होने लगे, बचपन
में नर्मदा में
छलांग लगाने वाले
शिवराज ने साहस
और बहादुरी से
भरा ऐसा कारनामा
कर दिखाया कि
वो अपने अध्यापकों
के आंखों के
तारे बन गए।
मॉडल
स्कूल रिटायर्ड शिक्षक
के के सी
जैन बताते हैं
कि स्कूल की
एक ट्रिप बॉम्बे
और गोवा के
लिए निकली थी।
जब हम गोवा
से लौट रहे
थे तो पहाड़ी
ढलान पर जैसे
ही बस आई
तो ड्राइवर ने
जोर से चिल्लाकर
कहा, बस का
ब्रेक फेल हो
गया है। आप
लोग कूद जाइए।
सब सोचने लगे।
जितनी देर में
लोग सोचते इतने
में शिवराज ने
गेट खोला और
बस से बाहर
चले गए। गिरे
और उठकर चले।
फिर कुछ लड़के
और कूदे। ड्राइवर
ने बस धीमी
की। फिर इन
लड़कों ने मिलकर
बस के आगे
पत्थर रखे। फिर
बस रुक गई।
निजी
जिंदगी में भी
शिवराज का ये
साहस नजर आता
है। सियासत में
पूरी तरह रमने
के बाद शिवराज
अपनी शादी टालते
रहे। पिता ने
हारकर उनके छोटे
भाई और बहन
की शादी पहले
कर दी। आखिरकार
1992 में 33 साल की
उम्र में बहन
की जिद पर
शिवराज शादी के
लिए राजी हुए।
इस
बारे में उनकी
पत्नी साधना सिंह
बताती हैं कि
ये मुझे देखने
आए। बस देखने
आए थे। इनकी
तरफ से प्यार
हो गया। मैंने
सोचा क्या करना
है। उसके बाद
शादी हो गई।
मम्मी पापा ने
देखा ठीक है,
अच्छा लड़का है।
शिवराज तब नेता
थे, सांसद थे
उस समय। बस
एक लेटर लिखा
था इन्होंने मुझे।
उसमें अपनी भावनाएं
व्यक्त की थी।
वो भावनाएं मैं
नहीं बताऊंगी।
आभार : IBN खबर
साधना
सिंह को शिवराज
का सरल स्वभाव
पसंद आ गया
जिसमें किसी फिल्मी
हीरो जैसा साहस
भी नजर आता
था। साधना सिंह
बताती हैं कि
हम लोग चार-पांच बार
मिले। अपने घर
में झूठ बोलकर
ये मुझसे मिलने
आए थे। हमने
होली मनाई। जब
इन्होंने गुलाब का फूल
देकर बोला ये
तुम्हारे लिए है।
1992 में शिवराज
की शादी गोंदिया
के मतानी परिवार
की बेटी साधना
सिंह से हुई।
दोनों के कार्तिकेय
और कुणाल दो
बेटे भी हैं।
पत्नी की स्कूल
में बच्चों की
पेरेंट टीचर मीटिंग
में शिवराज के
ना जाने की
शिकायतें हमेशा बनी रहीं।
मगर हर समझदार
पति की तरह
शिवराज भी इस
बात के लिए
अपनी पत्नी की
तारीफ करते हैं
कि वो बहुत
एडजस्टिंग हैं।
शिवराज
सिंह चौहान बताते
हैं कि सार्वजनिक
जीवन में सामान्य
परिवार की तरह
जीवन नहीं जी
सकते। मैंने पत्नी
से शादी के
पहले ही कहा
था कि इस
पहलू को ध्यान
में रखना। ऐसा
नहीं कि सबेरे
घर से निकले
और शाम को
घर आ गए।
दोपहर में साथ
खाना खा रहे
हैं। ये नहीं
हो पाएगा और
उन्होंने स्वीकार किया और
आदर्श पत्नी की
तरह मेरा साथ
निभाया।
कहते
हैं हर सफल
पुरुष के पीछे
एक महिला होती
है। शिवराज सिंह
चौहान के लिए
उनकी पत्नी साधना
वही महिला हैं।
अब शिवराज जब
तीसरी बार सीएम
पद की दावेदारी
के साथ चुनाव
प्रचार कर रहे
हैं तो पत्नी
साधना सिंह अपने
बेहतरीन प्रबंधन से उन्हें
घर की चिंता
से मुक्त रखे
हुए हैं ताकि
मध्यप्रदेश की जनता
के लिए शिवराज
की चिंता में
कोई कमी न
रह जाए।
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